Study

Deep Daan

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  • 10.lचारों तरफ जहरीले सर्प घूम रहे हैं” पन्ना के इस कथन का आशय क्या था?
    राजकुमार उदयसिंह ने पन्ना से हठ किया कि वह भी चलकर दीपदान उत्सव को देखे। पन्ना के मना करने पर उदयसिंह अकेले ही वहाँ जाने लगा तो पन्ना ने उपर्युक्त बात कही। जहरी
  • प्रश्न 2. चित्तौड़ का कुलदीपक कौन था?
    चित्तौड़ का कुलदीपक राज परिवार का एकमात्र पुत्र कुँवर उदयसिंह था।
  • प्रश्न 5पहाड़ बनने से क्या होगा? -उपर्युक्त कथन किसने किससे कहा? इसका अर्थ स्पष्ट कीजिए।
    उपर्युक्त कथन रावल सरूप सिंह की पुत्री सोना ने धाय माँ पन्ना से कहा। इसका अर्थ यह है कि धाय माँ पन्ना बनवीर सिंह के साथ मिल जाए तथा अपने कर्तव्य कुँवर उदयसिंह क
  • 7.‘महल में धाय माँ अरावली बनकर बैठ गई है।’ वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए।
    पन्ना धाय पर राजकुमार उदयसिंह के लालन-पालन और सुरक्षा का भार था। किशोरी सोना के अनुसार पन्ना धाय अपने पुत्र चन्दन की अपेक्षा कुँवर उदयसिंह का विशेष ध्यान रखती थ
  • 9.मेरे महाराणा का नमक मेरे रक्त से भी महान है” इस कथन के प्रकाश में पन्ना के चरित्र की किन्हीं दो विशेषताओं का परिचय कराइए।
    वह स्वामी के नमक से बने अपने रक्त (पुत्र) को स्वामी की संतान की रक्षा में अर्पित करने को प्रसन्नता से तैयार है। पन्ना के चरित्र की दूसरी विशेषता उसका अपूर्व त्य
  • प्रश्न 1. पन्ना कौन थी?
    पन्ना चित्तौड़ के राजसिंहासन के उत्तराधिकारी महाराणा साँगा के पुत्र कुँवर उदयसिंह की धाय थी।
  • प्रश्न 6-तुम्हारा बहता हुआ बोझ पत्थर भी अपने सिर पर धारण करेंगे’ का क्या तात्पर्य है?
    सोना पन्ना धाय को अपनी देशभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा छोड़कर बनवीर के साथ मिल जाने की सलाह दे रही है।
  • प्रश्न 4.बनवीर पन्ना को महल में अरावली पहाड़ की तरह बैठी क्यों मानता था?
    क्योंकि वह उदय की सुरक्षा करने के कारण, बनवीर की मेवाड़ का राजा बनने की योजना में बाधक थी। प्रश्न 3.
  • प्रश्न 3. बनवीर द्वारा आयोजित नृत्य-गीत का उत्सव पन्ना को क्यों अच्छा नहीं लग रहा था ?
    पन्ना को इस उत्सव के पीछे बनवीर के किसी षड्यंत्र की आशंका थी और वैसे भी यह नाच-गाने वीरों को शोभा नहीं देता था।
  • 8.चित्तौड़ राग-रंग की भूमि नहीं है, यहाँ आग की लपटें नाचती हैं।” इस पंक्ति का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए।
    संकट की घड़ी में राग-रंग मनाना चित्तौड़वासियों को शोभा नहीं देता। वीरों को तो रणचण्डी का नृत्य शोभा देता है। यही चित्तौड़ की परंपरा है। उसकी वीरांगनाएँ या तो र